दो दिन हु पुरे , और मैं नहीं सोया ,
दर्द से भारी ,ये मेरा दिल नहीं रोया,
चलता हु मैं , जिस गल्ली , जिस डगर ,
खिल खिलाते सभी , बस मैं ही हु खोया !
रिश्तो का अब मुझ पे बड़ा भार था ,
मेरी पीड़ा का कारन यह संसार था,
डरता हु की कहीं ये न तोड़े मुझे ,
रात हो , या हो दिन बात येही सूझे ,
मिलता हु मैं जिसे इस गली उस डगर,
बडबडाते सभी , बस मैं ही हु खोया !
भीड़ में तनहा चलता फिरता हु मैं,
तक्रकर्के खुद से नीचे गिरता हु मैं,
मेरा कोई नहीं मुह्ह्को लगने लगा ,
धोके हैं हर कहीं , सब है देते दगा,
ऐसा बिलकुल नहीं ,ऐसी बातें ना कर ,
चिल्लाते सभी , बस मैं ही हु खोया !...
नफरत का मुह्ज्मे एक घर बन गया ,
सोचते सोचते अब यह घर भर गया ,
इस घर के किवाड़ो को मैं ना धक् सका,
आते वोह भी रहे , ना मन कर सका ,
रहते हैं वोह यहीं , हर घडी हर पहर ,
माफ़ी हैं मांगते... , बस मैं ही हु खोया !...
"कमज़ोर है तू , यह तुने साबित किया ,
नफरत का तुने , आज हित ले लिया ,
माफ़ कर दे देता उनको , गलती करते सभी,
जानता तू भी है , तुझपे मरते सभी ,
रोले जी भर के तू , मन को हल्का तू कर ,
दोस्त है यह सभी , डाटने से ना दर,"
बात कहदी है तुने पते की अभी ,
मैं समाज गया ,... बस वोह अब भी है खोया .... वोह अब भी है खोया !!!!
-राहुल
